**आयुर्वेद का इतिहास एवं विकास**
आयुर्वेद का इतिहास भारतीय सभ्यता के आरम्भिक काल से जुड़ा हुआ है। यह विश्व की सबसे प्राचीन एवं सतत चिकित्सा पद्धतियों में से एक है, जिसकी उत्पत्ति लगभग 5000 वर्ष पूर्व वैदिक काल में हुई। आयुर्वेद का सर्वप्रथम उल्लेख **ऋग्वेद** (लगभग 1500-1200 ई.पू.) में मिलता है, जहाँ विभिन्न औषधीय पौधों एवं रोगों के उपचार का वर्णन है। इसके पश्चात **अथर्ववेद** में तो आयुर्वेद को एक उपवेद के रूप में स्थान दिया गया है, जिसमें लगभग 114 सूक्तियाँ विशेष रूप से चिकित्सा विज्ञान को समर्पित हैं।
**प्राचीन काल (वैदिक युग से गुप्त काल तक)—** आयुर्वेद का स्वर्णयुग छठी शताब्दी ई.पू. से लेकर गुप्त काल (लगभग 320-550 ई.) तक माना जाता है। इसी काल में आयुर्वेद के दो अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथों—**चरक संहिता** और **सुश्रुत संहिता**—की रचना हुई। आचार्य चरक को ‘कायचिकित्सा’ (आंतरिक चिकित्सा) का जनक माना जाता है, जिन्होंने रोग निदान, औषधि निर्माण एवं चिकित्सा पद्धतियों का सुव्यवस्थित विवरण प्रस्तुत किया। आचार्य सुश्रुत को ‘शल्य चिकित्सा का पितामह’ कहा जाता है; उन्होंने 300 से अधिक शल्य क्रियाओं, 120 प्रकार के शस्त्रों और विस्तृत शारीरिक रचना का वर्णन किया। उन्होंने प्लास्टिक सर्जरी, मोतियाबिंद ऑपरेशन तथा गर्भविज्ञान जैसे जटिल विषयों पर भी प्रकाश डाला। इसी युग में वाग्भट ने **अष्टांग हृदय** और **अष्टांग संग्रह** की रचना की, जिनमें आयुर्वेद के आठ अंगों का सुंदर संकलन है।
**मध्यकाल (8वीं से 18वीं शताब्दी)—** इस काल में आयुर्वेद का प्रभाव भारत से बाहर भी फैला। अरब देशों में आयुर्वेदिक ग्रंथों का अनुवाद हुआ, जिससे ‘उनानी’ चिकित्सा पद्धति को भी आयुर्वेद से प्रेरणा मिली। तिब्बत, चीन, मंगोलिया, श्रीलंका, जापान एवं दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार हुआ। हालाँकि, भारत में मुस्लिम आक्रमणों एवं विदेशी शासन के कारण आयुर्वेद की प्रगति कुछ अवरुद्ध हुई। इसके बावजूद, इस काल में भी शार्ङ्गधर, भावमिश्र एवं माधवकर जैसे विद्वानों ने नए ग्रंथों की रचना की। **माधव निदान** रोग-निदान का अत्यंत प्रभावी ग्रंथ है।
**आधुनिक काल (19वीं सदी से वर्तमान तक)—** ब्रिटिश शासन में पाश्चात्य चिकित्सा (एलोपैथी) का प्रचलन बढ़ा तथा आयुर्वेद की उपेक्षा हुई, किन्तु 20वीं सदी के प्रारम्भ में महात्मा गाँधी एवं अन्य राष्ट्रवादी नेताओं ने भारतीय चिकित्सा पद्धति के पुनरुत्थान पर बल दिया। 1920 में आयुर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सा के लिए पृथक विभागों की स्थापना हुई। 1971 में **केन्द्रीय आयुर्वेद एवं सिद्ध अनुसंधान परिषद** (CCRAS) की स्थापना की गई, जो आज अनुसंधान कार्यों में अग्रणी है। 1995 में **राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान** (NIA), जयपुर को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। वर्ष 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने आयुर्वेद को एक मान्यता प्राप्त चिकित्सा पद्धति के रूप में स्वीकार किया। 2022 में WHO एवं भारत सरकार ने **पहला WHO वैश्विक आयुर्वेद सम्मेलन** आयोजित किया। आज देशभर में 300 से अधिक आयुर्वेदिक महाविद्यालय, अनेक अनुसंधान केन्द्र एवं 700 से अधिक आयुर्वेदिक औषधि निर्माण इकाइयाँ कार्यरत हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग एवं आयुर्वेद ने भारत को वैश्विक स्वास्थ्य मानचित्र पर एक नई पहचान दी है। आयुर्वेद आज अपने प्राचीन ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों के साथ समन्वयित करते हुए निरंतर विकसित हो रहा है।